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Sunday, 25 December 2016

पचास का नोट


एक  व्यक्ति  ऑफीस में देर  रात तक काम  करने  के  बाद  थका -हारा घर  पहुंचा| दरवाजा  खोलते  ही  उसने  देखा  कि  उसका  पांच  वर्षीय  बेटा  सोने  की  बजाये  उसका  इंतज़ार  कर  रहा  है|

अन्दर  घुसते  ही  बेटे  ने  पूछा —“पापा, क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?”
हाँ -हाँ  पूछो, क्या पूछना है ?” पिता ने कहा|
बेटा -पापा, आप एक घंटे में कितना कमा लेते हैं?”

इससे तुम्हारा क्या लेना देना तुम ऐसे बेकार के सवाल क्यों कर रहे हो?” पिता ने झुंझलाते हुए उत्तर दियाबेटा - मैं बस यूँही जानना चाहता हूँ| प्लीज़ बताइए  कि आप एक घंटे में कितना कमाते हैं ?”

पिता ने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा, “100 रुपये

अच्छा ”, बेटे ने मासूमियत से सर झुकाते हुए कहा -,“पापा क्या आप मुझे 50 रूपये उधार दे सकते हैं ?”

इतना सुनते ही वह  व्यक्ति आग बबूला हो उठा, “तो तुम इसीलिए ये फ़ालतू का सवाल कर रहे थे ताकि मुझसे पैसे लेकर तुम कोई बेकार का खिलौना या उटपटांग चीज खरीद सको ….चुप चाप अपने कमरे में जाओ और सो जाओ ….सोचो तुम कितने सेल्फिश हो मैं दिन रात मेहनत करके पैसे कमाता हूँ और तुम उसे बेकार की चीजों में बर्वाद करना चाहते हो|

यह सुन बेटे की आँखों में आंसू आ गएऔर वह अपने कमरे में चला गया|

व्यक्ति अभी भी गुस्से में था और सोच रहा था कि आखिर उसके बेटे कि ऐसा करने कि हिम्मत कैसे हुईपर एक -आध घंटा बीतने के बाद वह थोडा शांत हुआ, और सोचने लगा कि हो सकता  है कि उसके बेटे ने सच -में किसी ज़रूरी काम के लिए पैसे मांगे हों, क्योंकि आज से पहले  उसने कभी इस तरह से पैसे नहीं मांगे थे|

फिर वह उठ कर बेटे के कमरे में गया और बोला, “क्या तुम सो रहे हो ?”, “नहींजवाब आयामैं सोच रहा था कि शायद मैंने बेकार में ही तुम्हे डांट दिया, दरअसल दिन भर के काम से मैं बहुत थक गया थाव्यक्ति ने कहा|

मुझे माफ़ कर दो….ये लो अपने पचास रूपये.ऐसा कहते हुए उसने अपने बेटे के हाथ में पचास की नोट रख दी|

थैन्क्यु पापा” बेटा ख़ुशी से पैसे लेते हुए कहा, और फिर वह तेजी से उठकर अपनी आलमारी की तरफ गया, वहां से उसने ढेर सारे सिक्के निकाले और धीरे-धीरे उन्हें गिनने लगा|

यह देख व्यक्ति फिर से क्रोधित होने लगा, “जब तुम्हारे पास पहले से ही पैसे थे तो तुमने मुझसे और पैसे क्यों मांगे ?”

क्योंकि मेरे पास पैसे कम थे, पर अब पूरे हैंबेटे ने कहा|

पापा अब मेरे पास 100 रूपये हैं| क्या मैं आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ ? प्लीज़ आप ये पैसे ले लोजिये और कल घर जल्दी आ जाइये, मैं आपके साथ बैठकर खाना खाना चाहता हूँ|

अजीब रिश्ता हैं मेरा ऊपर वाले के साथ
जब भी मुसीबत आती हैं
न जाने किस रूप मे आता हैं
हाथ पकड़ कर पार लगा देता हैं
मैं उसके सामने सर झुकाता हूँ

वो सबके के सामने मेरा सर उठाता हैं ।


Saturday, 24 December 2016

पिता का उपहार


एक बहुत ही श्रीमन्त उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है,
तो उसके पिता उसकी परीक्षा के विषय में पूछते है तो वो जवाब में कहता है की हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ, "अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है..?"

तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं अवश्य ला दूंगा। ये तो उनके लिए आसान था उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी।

जब पुत्र ने सुना तो वो दुगुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है।

दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया की वे उसका इनाम कार तैयार रखे मै घर आ रहा हूं।

घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी। वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ

उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा लो ये तुम्हारा गिफ्ट।

पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया

लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी की पिता जी आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा.. लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हु और तब तक वापस नही आऊंगा जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लू। और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया।

समय बीतता गया..
पुत्र होशयार था, होनहार था, जल्दी ही बहुत धनवान बन गया शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा कभी कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जातीवो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था इतना पैसा रहने के बाद भी मेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं की। यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था।

एक  दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी। उसने सोचा क्या छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ अच्छा नहीं हुआ। ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हु। ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा

तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया की मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हे याद करते रहे और रोते हुए चल बसे

जाते जाते कह गए की मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना की आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले। तुम्हारा कोई पता नही होनेसे तुम्हे सूचना नहीं दे पाये।

यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ

घर पहुच कर पिता के कमरे जाकर उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा

पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था "मेरे प्यारे पुत्रतुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मै तुम्हे कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं..  ये सोचकर ये रामायण दे रहा हु",
पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था।

ये देखकर उस पुत्र को बहुत दुख हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा।

हम हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते है।

पिता तो ठीक है। इश्वर भी हमे अपार गिफ्ट देते हैलेकिन हम अज्ञानी हमारे मनपसन्द पैकिंग में ना देखकर, पा कर भी खो देते है।

हमे अपने माता पिता के प्रेम से दिये ऐसेे अनगिनत उपहारों का प्रेम का सम्मान करना चाहिए और उनका धन्यवाद करना चाहिये।


सब अजनबी क्यों हो जाते हैं?


एक पाँच छे. साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था

कपड़े में मेल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे-नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे।

बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था।

जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा - "क्या मांगा भगवान से"?

उसने कहा - "मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए स्वर्गमेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्रमेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है उसके लिए पैसे"।

"तुम स्कूल जाते हो"? अजनबी का सवाल स्वाभाविक सा सवाल था।

"हां जाता हूं" उसने कहा।

"किस क्लास में पढ़ते हो ?" अजनबी ने पूछा

"नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ, बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है" बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।

"तुम्हारा कोई रिश्तेदार"? न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा।

"पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होतामाँ झूठ नहीं बोलतीपर अंकलमुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती हैजब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती हैजब कहता हूँ माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मेंने खा लिया था, उस समय लगता है झूठ बोलती है"

"बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?"

"बिल्कुलु नहीं"

"क्यों"

"पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं अंकलहमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा - पास से गुजर जाते हैं"

अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी। 

फिर उसने कहा, "हर दिन इसी इस मंदिर में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा - यहा सब आने वाले मेरे पिताजी को जानते थे - मगर हमें कोई नहीं जानता, बच्चा जोर-जोर से रोने लगा" अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं?"

मेरे पास इसका कोई जवाब नही था और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब है।

ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं। बस एक कोशिश कीजिये और अपने आसपास ऐसे ज़रूरतमंद यतिमो, बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद किजिए

मंदिर मे सीमेंट या अन्न की बोरी देने से पहले अपने आस - पास किसी गरीब को देख लेना शायद उसको आटे की बोरी की ज्यादा जरुरत हो।